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बुधवार, 23 मार्च 2016

रंग रंग राधा हुई, कान्हा हुए गुलाल


रंग रंग राधा हुई, कान्हा हुए गुलाल
वृंदावन होली हुआ सखियाँ रचें धमाल
होली राधा श्याम की और न होली कोय
जो मन रांचे श्याम रंग, रंग चढ़े ना कोय
नंदग्राम की भीड़ में गुमे नंद के लाल
सारी माया एक है क्या मोहन क्या ग्वाल
आसमान टेसू हुआ धरती सब पुखराज
मन सारा केसर हुआ तन सारा ऋतुराज
बार बार का टोंकना बार बार मनुहार
धूम धुलेंडी गाँव भर आँगन भर त्योहार
फागुन बैठा देहरी कोठे चढ़ा गुलाल
होली टप्पा दादरा चैती सब चौपाल
सरसों पीली चूनरी उड़ी़ हवा के संग
नई धूप में खुल रहे मन के बाजूबंद
महानगर की व्यस्तता मौसम घोले भंग
इक दिन की आवारगी छुट्टी होली रंग
अंजुरी में भरपूर हों सदा रूप रस गंध
जीवन में अठखेलियाँ करता रहे बसंत !!


...होली के पावन अवसर पर शुभकामनाएँ !!

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

प्यार का भी भला कोई नाम होता है ...


तुम मिले तो जिंदगी में रंग भर गए। 
तुम मिले तो जिंदगी के संग हो लिए। 

प्यार का भी भला कोई दिन होता है। इसे समझने में तो जिंदगियां गुजर गईं और प्यार आज भी बे-हिसाब है। कबीर ने यूँ ही नहीं कहा कि 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय' . प्यार का न कोई धर्म होता है, न जाति, न उम्र, न देश और न काल। … बस होनी चाहिए तो अंतर्मन में एक मासूम और पवित्र भावना। प्यार लेने का नहीं देने का नाम है, तभी तो प्यार समर्पण मांगता है। कभी सोचा है कि पतंगा बार-बार दिये के पास क्यों जाता है, जबकि वह जानता है कि दीये की लौ में वह ख़त्म हो जायेगा, पर बार-बार वह जाता है, क्योंकि प्यार मारना नहीं, मर-मिटना सिखाता है। तभी तो कहते हैं प्यार का भी भला कोई नाम होता है। यह तो सबके पास है, बस जरुरत उसे पहचानने और अपनाने की है न कि भुनाने की।



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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

ओ प्रेम !

ओ प्रेम !
जन्मा ही कहाँ है
अभी तू मेरे कोख से कि कैसे कहूँ
तुझे जन्मदिन मुबारक

दुबका पड़ा है
अब भी मेरी कोख में
सहमा-सहमा सा कि कैसे चूमूँ
माथा तेरा
चूस रहा है
अब भी आँवल से
कतरा कतरा
लहू मेरा
कि कैसे पोषूँ
धवल से
नहीं जन्मना है
तुझे इस
कलयुगी दुनिया में
ले चले मुझे कोई ब्रह्माण्ड के उस पार !

-संगीता सेठी 
प्रशासनिक अधिकारी भारतीय जीवन बीमा निगम 
अम्बिकापुर
sangeeta.sethi@licindia.com

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

ये दुनिया हमारी सुहानी न होती


ये दुनिया हमारी सुहानी न होती,
कहानी ये अपनी कहानी न होती ।

ज़मीं चाँद -तारे सुहाने न होते,
जो प्रिय तुम न होते,अगर तुम न होते।
न ये प्यार होता,ये इकरार होता,
न साजन की गलियाँ,न सुखसार होता।

ये रस्में न क़समें,कहानी न होतीं,
ज़माने की सारी रवानी न होती ।
हमारी सफलता की सारी कहानी,
तेरे प्रेम की नीति की सब निशानी ।

ये सुंदर कथाएं फ़साने न होते,
सजनि! तुम न होते,जो सखि!तुम न होते ।


तुम्हारी प्रशस्ति जो जग ने बखानी,
कि तुम प्यार-ममता की मूरत,निशानी ।
ये अहसान तेरा सारे जहाँ पर,
तेरे त्याग -द्रढता की सारी कहानी ।

ज़रा सोचलो कैसे परवान चढ़ते,
हमीं जब न होते,जो यदि हम न होते।
हमीं हैं तो तुम हो सारा जहाँ है,
जो तुम हो तो हम है, सारा जहाँ है।

अगर हम न लिखते,अगर हम न कहते,
भला गीत कैसे तुम्हारे ये बनते।
किसे रोकते तुम, किसे टोकते तुम,
ये इसरार इनकार ,तुम कैसे करते ।

कहानी हमारी -तुम्हारी न होती,
न ये गीत होते, न संगीत होता।

सुमुखि !तुम अगर जो हमारे न होते,
सजनि!जो अगर हम तुम्हारे न होते॥

डा श्याम गुप्त
  के-३४८, आशियाना, लखनऊ २२६०१२
drgupta04@gmail.com

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे

मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे,
गीत का स्वर मधुर माधुरी हो गया।
अक्षर अक्षर सरस आम्रमंजरि हुआ,
शब्द मधु की भरी गागरी हो गया।

तुम जो ख्यालों में आकर समाने लगे,
गीत मेरे कमल दल से खिलने लगे।
मन के भावों में तुमने जो नर्तन किया,
गीत ब्रज की भगति- बावरी हो गया। ...मेरे गीतों में ..... ॥

प्रेम की भक्ति सरिता में होके मगन,
मेरे मन की गली तुम समाने लगे।
पन्ना पन्ना सजा प्रेम रसधार में,
गीत पावन हो मीरा का पद हो गया।

भाव चितवन के मन की पहेली बने,
गीत कबीरा का निर्गुण सबद हो गया।
तुमने छंदों में सज कर सराहा इन्हें ,
मधुपुरी की चतुर नागरी हो गया। .....मेरे गीतों में..... ॥

मस्त में तो यूहीं गीत गाता रहा,
तुम सजाते रहे,मुस्कुराते रहे।
गीत इठलाके तुम को बुलाने लगे,
मन लजीली कुसुम वल्लरी हो गया।

तुम जो हंस हंस के मुझको बुलाते रहे,
दूर से छलना बन कर लुभाते रहे।
भाव भंवरा बने, गुनगुनाने लगे ,
गीत कालिका -नवल-पांखुरी हो गया। .....मेरे गीतों में... ॥
@ डा. श्याम गुप्त 

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नाम— डा. श्याम गुप्त      
पिता—स्व.श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता, माता—स्व.श्रीमती रामभेजीदेवी, पत्नी—श्रीमती सुषमा गुप्ता एम.ए.(हि.).
जन्म— १० नवम्बर,१९४४ ई....ग्राम-मिढाकुर, जि. आगरा, उ.प्र.  भारत ..
शिक्षा—एम.बी.,बी.एस.,एम.एस.(शल्य), सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय,आगरा.
व्यवसाय-चिकित्सक (शल्य)-उ.रे.चिकित्सालय, लखनऊ से व.चि.अधीक्षक पद से सेवा निवृत ।
साहित्यिक-गतिविधियां--विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध, काव्य की सभी विधाओं—कविता-गीत,   अगीत, गद्य-पद्य, निबंध, कथा-कहानी-उपन्यास, आलेख, समीक्षा आदि में लेखन। ब्लोग्स व इन्टर्नेट पत्रिकाओं में लेखन.
प्रकाशित कृतियाँ -- १. काव्य दूत २.काव्य निर्झरिणी ३.काव्य मुक्तामृत (काव्य सन्ग्रह)  ४. सृष्टि–अगीत-विधा महाकाव्य ५.प्रेम-काव्य-गीति-विधा महाकाव्य ६.शूर्पणखा खंड-काव्य,  ७. इन्द्रधनुष उपन्यास, ८. अगीत साहित्य दर्पण- अगीत कविता विधा का छंद विधान, ९.ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में काव्य संग्रह ) एवं १०. कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए,रुबाई व शेर का संग्रह )
शीघ्र-प्रकाश्य- तुम तुम और तुम (गीत-सन्ग्रह), गज़ल सन्ग्रह, श्याम स्मृति, अगीत-त्रयी, ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद.....  
मेरे ब्लोग्स( इन्टर्नेट-चिट्ठे)—श्याम स्मृति (http://shyamthot.blogspot.com), साहित्य श्याम, अगीतायन, छिद्रान्वेषी, विजानाति-विजानाति-विज्ञान एवं हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान...
सम्मान आदि—
१.न.रा.का.स.,राजभाषा विभाग,(उ प्र) द्वारा राजभाषा सम्मान (काव्य संग्रह काव्यदूत व काव्य-निर्झरिणी हेतु).
२.अभियान जबलपुर संस्था (म.प्र.) द्वारा हिन्दी भूषण सम्मान( महाकाव्य ‘सृष्टि’ हेतु )
३.विन्ध्यवासिनी हिन्दी विकास संस्थान, नई दिल्ली द्वारा बावा दीप सिन्घ स्मृति सम्मान,
४.अ.भा.अगीतपरिषद द्वारा-श्री कमलापति मिश्र सम्मान व अ.भा.साहित्यकार दिवस पर प.सोहनलाल द्विवेदी सम्मान|
५. अ.भा.अगीत परिषद द्वारा अगीत-विधा महाकाव्य सम्मान( अगीत-विधा महाकाव्य सृष्टि हेतु)
६.जाग्रति प्रकाशन, मुम्बई द्वारा-साहित्य-भूषण एवं पूर्व पश्चिम गौरव सम्मान,
७.इन्द्रधनुष सन्स्था बिज़नौर द्वारा..काव्य-मर्मज्ञ सम्मान.
८.छ्त्तीसगढ शिक्षक साहित्यकार मंच, दुर्ग द्वारा-हिरदे कविरत्न सम्मान,
९.युवा कवियों की सन्स्था; ’सृजन’’ लखनऊ द्वारा महाकवि सम्मान एवं सृजन-साधना वरिष्ठ कवि सम्मान.
१०.शिक्षा साहित्य व कला विकास समिति,श्रावस्ती द्वारा श्री ब्रज बहादुर पांडे स्मृति सम्मान
११.अ.भा.साहित्य संगम,उदयपुर द्वारा राष्ट्रीय-प्रतिभा-सम्मान व शूर्पणखा काव्य-उपन्यास हेतु 'काव्य-केसरी' उपाधि |
१२. जगत सुन्दरम कल्याण ट्रस्ट द्वारा महाकवि जगत नारायण पांडे स्मृति सम्मान.
१३. बिसारिया शिक्षा एवं सेवा समिति, लखनऊ द्वारा ‘अमृत-पुत्र पदक
१४. कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, बेंगालूरू द्वारा सारस्वत सम्मान(इन्द्रधनुष –उपन्यास हेतु)
१५.विश्व हिन्दी साहित्य सेवा संस्थान,इलाहाबाद द्वारा ‘विहिसा-अलंकरण’-२०१२....आदि..
१६.युवा रचनाकार मंच द्वारा डा अनंत माधव चिपलूणकर स्मृति सम्मान -२०१५
१७.साहित्यामंडल श्रीनाथ द्वारा –द्वारा हिन्दी साहित्य विभूषण सम्मान
पता—  डा श्याम गुप्त,  सुश्यानिदी

शनिवार, 13 जून 2015

जब से मैं रंगा हूँ तेरे प्रेम रंग में रंग रसिया

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सुभाष प्रसाद गुप्ता की  कविताएं. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

जब से मैं रंगा हूँ तेरे प्रेम रंग में रंग रसिया,
मेरा तन मन सब  इंद्रधनुषी होने  लगा हैI


जब से मिला है धरकन तेरे सुर में प्रेम पिया,
मध्यम के  बिना सुर सप्तक सजने लगा हैI


जब से चला है तेरे प्रेम का जादू मन माहिया,
मद्यपान  बिना मेरा सुध बुध खोने लगा हैI


जब से मिला है तेरा पथ साथ में सोने साथिया,
अब चाँद और धरा की दूरी सिमटने लगा हैI


जब से मन मगन है तेरे धुन में संग सांवरिया,
साज़ सरगम के बिना कदम थिरकने लगा हैI

जब से मिला है तेरे रूह में साँस वन बसिया,
चंपा चमेली खिले बिना सुबास होने लगा हैI




विरहों के अग्नि में लपटी है वर्षों से मेरी काया
दादूर पुकारती सांवरिया सावन की भाषा बोल दो


माघ की शीत वसन में सिमटी है तेरी माया
कोयल कूँ कूँ पुकारती सांवरिया रंग बसंती घोल दो


अंधियारी दिवा में बिलखती है तेरी किशलया
पपीहरा पीयूँ  पुकारती सांवरिया अधर पट खोल दो


मधुर मिलन की आस में तरसती है तेरी छाया
भँवरे गुं गुं पुकारती सांवरिया प्रेम गीत मोल दो


तीव्र सप्तक  के लय में थिरकती है तेरी सौम्या
घुँघरू झनन  पुकारती सांवरिया पंचम रस घोल दो

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नाम                               : सुभाष प्रसाद गुप्ता
जन्म तिथि                      : ०७/ १/ १९७५
जन्म स्थान                     : बिहार में मिथिला और भोजपुरी की अभिसरण स्थली में बागमती नदी के किनारे
शिक्षा                 :        किरोड़ीमल महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) से स्नातकोत्तर (राजनीतिज्ञ विज्ञान)
                          :        केंद्रीय हिंदी संस्थान से परा स्नातकोत्तर डिप्लोमा (जनसंचार और पत्रकारिता)
प्रशिक्षण               : भारतीय विदेश व्यापार संस्थान, नई दिल्ली से विदेश व्यापार में उन्मुखीकरण कार्यक्रम
                              : भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलूरू से सार्वजनिक नीति प्रबंधन में उन्मुखीकरण कार्यक्रम
                              :  तुर्की भाषा में उच्चतर  डिप्लोमा (अंकारा विश्वविद्यालय, तुर्की )

 पेशा                  :      पेशेवर कूटनीतिज्ञ (भारतीय विदेश सेवा)
पदस्थापन             : भारतीय कूटनिक मिशन  जकार्ता , अंकारा और इस्तांबुल में विभिन्न कार्यों का संपादन
                            : वर्तमान में प्रथम सचिव (राजर्थिक), भारत का राजदूतावास, खार्तूम, सूडान
भाषिक ज्ञान           : संस्कृत, हिंदी और इसकी विभिन्न बोलियाँ, अंग्रेजी, ऊर्दू, तुर्की और अज़री

 परिवार                : पत्नी (डा० रूचि गुप्ता - दन्त चिकित्सक) पुत्री-शताक्षी सुरुचि और पुत्र: ऋत्विक सुभांश
अभिरुचि              : ग़ज़ल, गीत और रंगमंच लेखन, अभिनय, फोटोग्राफी, संगीत सुनना इत्यादिi
हिंदी में लेखन          : पिछले पच्चीस वर्षों से, गीत (शताधिक), नाटक (प्रायोजित मिडिया और घूंघट में                                           
                                 पंचायत) रचनाएँ अप्रकाशित
ब्लॉग                 : क्षितिज की तरफ़ अनवरत सफ़र (http://subhashpgupta.blogspot.com/)
लक्ष्य                 : वैश़्विक शांति और भारतीय हितों की प्रोन्नति

रविवार, 20 अप्रैल 2014

ज़बां लफ्ज़े मुहब्बत है

ज़बां लफ्ज़े मुहब्बत है
दिलों में पर अदावत है ।

न कोई रूठना मनाना
यही तुम से शिकायत है ।

कि बस रोज़ी कमाते सब
नहीं कोई हिकायत है ।

मुहब्बत ही तो जन्नत है
अदावत दिन क़यामत है ।

पढ़ो तुम बन्द आँखों से
लिखी दिल पे इबारत है ।

ग़रीबों से जो हमदर्दी
 यही सच्ची इबादत़ है ।

कभी यों ग़ज़ल कह लेता
बड़ी उस  की इनायत है ।

-- डा सुधेश

परिचय :  दिल्ली  में सन १९७५ से । अत: दिल्ली वासी । जन्मतिथि  - ६जून सन  १९३३। जन्म स्थान  जगाधरी  ज़िला अम्बाला (हरियाणा ).  बचपन जगाधरी ,देवबन्द में बीता ।शिक्षा देवबन्द, मुज़फ़्फ़रनगर , देहरादून में पाई  । एम ए हिन्दी में ( नागपुर वि वि )  पीएच डी  आगरा विवि से । उ प़ के तीन कॉलेजों में अध्यापन के बाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू वि वि में २३ वर्षों तक अध्यापन । प़ोफेसर पद से सेवानिवृत्त । तीन बार विदेंश यात्राएँ । अब स्वतन्त्र लेखन ।

काव्य कृतियाँ 
                १ फिर सुबह होगी ही  ( राज पब्लिशिंग हाउस ,पुराना सीलमपुर  ,दिल्ली ) १९८३            
                २ घटनाहीनता के विरुद्ध ( साहित्य संगम , विद्याविहार , पीतमपुरा ,दिल्ली ) १९८८ ,            
                  ३ तेज़ धूप ( साहित्य संगम , दिल्ली ) सन १९९३ 
              ४ जिये गये शब्द ( अनुभव प़काशन , साहिबाबाद़ ,ग़ाज़ियाबाद ) सन १९९९ 
              ५ गीतायन ( गीत और ग़ज़लें ) कवि सभा,विश्वास नगर , शाहदरा ,दिल्ली - २००१
              ६ बरगद ( खण्डकाव्य ) प़खर प़काशन ,नवीनशाहदरा ,दिल्ली  - २००१ 
              ७ निर्वासन ( खण्ड काव्य ) साहित्य संगम , पीतमपुरा , दिल्ली - सन २००५ 
              ८जलती शाम (काव्यसंग़ह) अनुभव प़काशन , साहिबाबाद़, ग़ाज़ियाबाद-२००७ 
              ९ सप्तपदी , खण्ड ७(दोहा संग़ह ) अयन प़काशन , महरौली ,दिल्ली सन २००७ 
              १०हादसों के समुन्दर ( ग़ज़लसंग़ह )  पराग बुक्स , ग़ाज़ियाबाद - सन २०१० 
              ११ तपती चाँदनी ( काव्यसंग़ह ) अनुभव प़काशन , साहिबाबाद़ - २०१३ 

    आलोचनात्मक पुस्तकें 
          
                १ आधुनिक हिन्दी और उर्दू कविता की प़वृत्तियां ,राज पब्लिशिंग हाउस ,पुराना 
                  सीलम पुर  दिल्ली    सन १९७४ 
                २ साहित्य के विविध आयाम -शारदा प़काशन ,दिल्ली  १९८३ 
                  ३ कविता का सृजन और मूल्याँकन - साहित्य संगम, पीतमपुरा ,दिल्ली  १९९३
                  ४ साहित्य चिन्तन - साहित्य संगम , दिल्ली    १९९५ 
                  ५  सहज कविता ,स्वरूप और सम्भावनाएँ - साहित्य संग़म ,दिल्ली १९९६ 
                ६  भाषा ,साहित्य और संस्कृति - स्रार्थक प़काशन ,दिल्ली  २००३
                ७ राष़्ट्रीय एकता के सोपान - इण्डियन पब्लिशर्स,क़मला नगर ,दिल्ली २००४ 
                ८  सहज कविता की भूमिका - अनुभव प़काशन ,ग़ाज़ियाबाद २००८
                  ९ चिन्तन अनुचिन्तन - यश पब्लिकेंशन्स, दिल्ली  २०१२ 
              १०  हिन्दी की दशा और दिशा -जनवाणी प़काशन , दिल्ली  २०१३ 

    विविध प़काशन 
    तीन यात्रा वृत्तान्त ,दो संस्मरण संग़ह,एक उपन्यास,एक व्यंग्यसंग़ह ,
      एक आत्मकथा  प़काशित । कुल २९ पुस्तकें प़काशित ।

प़ाप्त पुरस्कार  , सम्मान 
    मध्यप़देश साहित्य अकादमी का भारतीय कविता पुरस्कार  २००६
    भारत सरकार के सूचना प़सारण मंत्रालय का भारतेन्दु हरिश्चन्द़ पुरस्कार २०००
    लखनऊ के राष्ट़़धर्म प़काशन  का राष्ट़़धर्म गौरव सम्मान  २००४
    आगरा की नागरी प़चारिणी सभा द्वारा सार्वजनिक अभिनन्दन  २००४ 









      



बुधवार, 16 अप्रैल 2014

हर जनम में साथ रहना, हर समय तुम मुस्कराना

तुम अकेले रह गए तो भोर का तारा बनूं मै।
मै अकेला रह गया तो रात बनकर पास आना।

तुम कलम की नोक से उतरे हो अक्षर की तरह।
मै समय के मोड़ पर बिखरा हूँ प्रस्तर की तरह।
तुम अकेले बैठकर बिखरी हुई प्रस्तर शिला पर,
सांध्य का संगीत कोई मौन स्वर में गुनगुनाना।

एक परिचय था पिघलकर घुल गया है सांस में।
रात भर जलता रहा दीपक सृजन की आस में।
दृश्य अंकित है तुम्हारा मिट न पाया आज तक
बिखरे हुए सपनों को चुनकर प्यार का एक घर बसाना।

बह रहा दरिया न रोको भंवर का परिहास देखो।
कह रहा उठ गिर कहानी लहर का अनुप्रास देखो।
एक कश्ती की तरह मै तुम किनारे के पथिक हो
शाम होते ही नदी से अपने घर को लौट जाना।

पर्वतों के पार जाकर मै तुम्हे आवाज दूंगा।
प्रीति के तारों से निर्मित मै तुम्हें एक साज दूंगा।
मेरी नज़रों में उतरकर आखिरी अनुबंध कर लो
हर जनम में साथ रहना हर समय तुम मुस्कराना।

-रविनंदन सिंह 
संपादक -'हिंदुस्तानी' शोध पत्रिका  

हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

प्रेम जीवन की परिभाषा है...

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज  'वेलेंटाइन डे' पर  प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती लीला तिवानी  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 



प्रेम मन की आशा है, 
करता दूर निराशा है, 
चन्द शब्दों में कहें तो, 
प्रेम जीवन की परिभाषा है. 

प्रेम से ही सुमन महकते हैं, 

प्रेम से ही पक्षी चहकते हैं, 
चन्द शब्दों में कहें तो, 
प्रेम से ही सूरज-चांद-तारे चमकते हैं, 

प्रेम शीतल-मंद-सुवासित बयार है, 
ऋतुओं में बसंत बहार है, 
चन्द शब्दों में कहें तो, 
प्रेम आनंद का आधार है. 

प्रेम हमारी आन है. 
प्रेम देश की शान है. 
चन्द शब्दों में कहें तो, 
प्रेम प्रभु का वरदान है. 

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

फिर वसंत की आत्मा आई - सुमित्रानंदन पंत


फिर वसंत की आत्मा आई,
मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण,
अभिवादन करता भू का मन !
दीप्त दिशाओं के वातायन,
प्रीति सांस-सा मलय समीरण,
चंचल नील, नवल भू यौवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,
आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण,
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
देख चुका मन कितने पतझर,
ग्रीष्म शरद, हिम पावस सुंदर,
ऋतुओं की ऋतु यह कुसुमाकर,
फिर वसंत की आत्मा आई,
विरह मिलन के खुले प्रीति व्रण,
स्वप्नों से शोभा प्ररोह मन !
सब युग सब ऋतु थीं आयोजन,
तुम आओगी वे थीं साधन,
तुम्हें भूल कटते ही कब क्षण? 
फिर वसंत की आत्मा आई,
देव, हुआ फिर नवल युगागम,
स्वर्ग धरा का सफल समागम !

(प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की वसंत पर एक गीत)

रविवार, 3 नवंबर 2013

यही प्यार है


डायरी के पुराने पन्नों को पलटिये तो बहुत कुछ सामने आकर घूमने लगता है. ऐसे ही इलाहाबाद विश्विद्यालय में अध्ययन के दौरान प्यार को लेकर एक कविता लिखी थी. आज आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ-

दो अजनबी निगाहों का मिलना
मन ही मन में गुलों का खिलना
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों ने आपस में ही कुछ इजहार किया
हरेक मोड़ पर एक दूसरे का इंतजार किया
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों की बातें दिलों में उतरती गई
रातों की करवटें और लम्बी होती गई
हाँ, यही प्यार है............ !!

सूनी आँखों में किसी का चेहरा चमकने लगा
हर पल उनसे मिलने को दिल मचलने लगा
हाँ, यही प्यार है............ !!

चाँद व तारे रात के साथी बन गये
न जाने कब वो मेरी जिन्दगी के बाती बन गये
हाँ, यही प्यार है............ !!


कृष्ण कुमार यादव

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

एक सपना

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती  अरविंद भटनागर ' शेखर'  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 


सपने, तान्या
एक दम छोटे से बच्चे 
जैसे होते हैं/
अपने मे खोए से / 
जाने क्या सोचते रहते हैं/
फिर हौले से मुस्कुरा देते हैं/
फिर कुछ गुनगुनाने लगते हैं/
फिर गाने लगते हैं/
फिर नाचने लगते हैं/
फिर चकित हो जाते हैं/
फिर खामोश हो जाते हैं/
फिर उदास हो जाते हैं/
फिर सुबकने लगते हैं/
फिर दर्द की भाप मे बदल जाते हैं/
ओर दिल से उठ कर 
आँखों की कोरों पर आ के 
बैठ जाते हैं/
ओर खोई खोई आँखों से 
अपनी तान्या को खोजने लगते हैं/
फिर उन्ही गालों पर
बहने लगते हैं
जिन्हे तुमने  चूमा था/
भीगे भीगे इस मौसम मे/
ऐसा ही एक सपना 
मेरे दिल से उठ कर /
मेरी आँखों की कोरों पर 
आ बैठा है/
ओर  खोज रहा है  तुम्हे |

-अरविंद भटनागर ' शेखर'

बुधवार, 25 सितंबर 2013

है चाहता बस मन तुम्हें

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती कृष्ण शलभ जी  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

शीतल पवन, गंधित भुवन
आनन्द का वातावरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

शतदल खिले भौंरे जगे
मकरन्द फूलों से भरे
हर फूल पर तितली झुकी
बौछार चुम्बन की करे
सब ओर मादक अस्फुरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

संझा हुई सपने जगे
बाती जगी दीपक जला
टूटे बदन घेरे मदन
है चक्र रतिरथ का चला
कितने गिनाऊँ उद्धरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

नीलाभ जल की झील में
राका नहाती निर्वसन
सब देख कर मदहोश हैं
उन्मत्त चाँदी का बदन
रसरंग का है निर्झरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें.
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कृष्ण शलभ बाल रचनाकार के अतिरिक्त गीत और गज़लों के क्षेत्र में एक जाना माना नाम हैं। वे भारत की सभी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।जन्म- १८ जुलाई १९४५ को सहारनपुर में।

प्रकाशित कृतियाँ-
चार बालगीत संग्रह- ओ मेरी मछली, टिली लिली झर्र, चीं चीं चिड़िया और सूरज की चिट्ठी। सहित एक वृहद संकलन ५५१ बाल कविताएँ जिसमें हिंदी बाल गीतों पर एक शोध भी प्रस्तुत किया गया है।

सम्मान पुरस्कार-
हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के पुरस्कार, भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर, नागरी साहित्य संस्थान बलिया, सृजन संस्थान रुड़की तथा अन्य अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत सम्मानित

शनिवार, 14 सितंबर 2013

मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती  उदयभानु ‘हंस’ जी  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

तू चाहे चंचलता कह ले,
तू चाहे दुर्बलता कह ले,
दिल ने ज्यों ही मजबूर किया,

 मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा।

यह प्यार दिए का तेल नहीं,
दो चार घड़ी का खेल नहीं,
यह तो कृपाण की धारा है,
कोई गुड़ियों का खेल नहीं।
तू चाहे नादानी कह ले,
तू चाहे मनमानी कह ले,
मैंने जो भी रेखा खींची, 

तेरी तस्वीर बना बैठा।

मैं चातक हूँ तू बादल है,
मैं लोचन हूँ तू काजल है,
मैं आँसू हूँ तू आँचल है,
मैं प्यासा तू गंगाजल है।
तू चाहे दीवाना कह ले,
या अल्हड़ मस्ताना कह ले,
जिसने मेरा परिचय पूछा, 

मैं तेरा नाम बता बैठा।

सारा मदिरालय घूम गया,
प्याले प्याले को चूम गया,
पर जब तूने घूँघट खोला,
मैं बिना पिए ही झूम गया।
तू चाहे पागलपन कह ले,
तू चाहे तो पूजन कह ले,
मंदिर के जब भी द्वार खुले, 

मैं तेरी अलख जगा बैठा।

मैं प्यासा घट पनघट का हूँ,
जीवन भर दर दर भटका हूँ,
कुछ की बाहों में अटका हूँ,
कुछ की आँखों में खटका हूँ।
तू चाहे पछतावा कह ले,
या मन का बहलावा कह ले,
दुनिया ने जो भी दर्द दिया, 

मैं तेरा गीत बना बैठा।

मैं अब तक जान न पाया हूँ,
क्यों तुझसे मिलने आया हूँ,
तू मेरे दिल की धड़कन में,
मैं तेरे दर्पण की छाया हूँ।
तू चाहे तो सपना कह ले,
या अनहोनी घटना कह ले,
मैं जिस पथ पर भी चल निकला, 

तेरे ही दर पर जा बैठा।

मैं उर की पीड़ा सह न सकूँ,
कुछ कहना चाहूँ, कह न सकूँ,
ज्वाला बनकर भी रह न सकूँ,
आँसू बनकर भी बह न सकूँ।
तू चाहे तो रोगी कह ले,
या मतवाला जोगी कह ले,
मैं तुझे याद करते-करते,

 अपना भी होश भुला बैठा।

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उदयभानु ‘हंस’ 
जन्‍म: २ अगस्‍त १९२६ 

शिक्षा: प्रभाकर, शास्‍त्री एवं एम.ए. (हिन्‍दी)

कार्यक्षेत्र: अध्यापन एवं लेखन। सनातन धर्म संस्‍कृत कॉलेज, मुलतान (१९४५-४७), रामजस कॉलेज, दिल्‍ली (१९५२-५३), गवर्नमेंट कॉलेज, हिसार (१९५४) - प्रिंसिपल पद से सेवानिवृत्‍त (१९८८)। 

प्रकाशित कृतियाँ: 'उदयभानु हंस रचनावली' दो खंड (कविता) दो खंड (गद्य)।

सम्मान एवं पुरस्कार: अनेक सम्मानों व पुरस्कारों से अलंकृत। देश विदेश में कविता-पाठ के लिए आमंत्रित कवि, 'दूरदर्शन' के दिल्‍ली एवं जालन्‍धर केन्‍द्रों द्वारा तीस-तीस मिनट के दो 'वृत्‍तचित्रों' का निर्माण एवं प्रसारण, हिन्‍दी में 'रूबाई' के प्रवर्तक कवि १९४८ 'रूबाई सम्राट' नाम से लोकप्रिय।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

खिलता वसंत

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती फाल्गुनी की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

इन फूलों का नाम मैं नहीं जानती, 
जानती हूं उस वसंत को 
जो इन फूलों के साथ मेरे कमरे में आया है .... 

चाहती हूं 
तुमसे रूठ जाऊं 
कई दिनों तक नजर ना आऊं 

मगर कैसे 
वासंती मौसम के पीले फूल 
ठीक मेरे सामने हैं 
बिलकुल तुम्हारी तरह 

सोचती हूं 
तुमसे मिले 
जब गुजर जमाना जाएगा
तब भी 
जीवन के हर एकांत में 
पीले फूलों का यह खिलता वसंत 
हर मौसम में मुझे 
मुझमें ही मिल जाएगा 
और तब तुम्हारा अनोखा प्यार 
मुझे बहुत याद आएगा।